बूंद-बूंद बचाई, खेत-खेत सिंचाई

न कोई रिसर्च और न कोई इंजीनियरिग। मगर, ठेठ देहाती सोच ने जल संरक्षण में जुटे बड़े-बड़े विज्ञानियों के लिए प्लानिंग की अलग धारा बहा दी। नलकूप से खेत तक पहुंचते-पहुंचते पानी का कुछ हिस्सा न केवल बर्बाद हो जाता था बल्कि सिंचाई में समय भी ज्यादा लगता था। नलकूप संचालक की सोच और किसानों की सहमति से खेत-खेत में भूमिगत पाइप बिछा दिए गए। हर खेत पर वाल्व लगे हैं। इस व्यवस्था से सिंचाई में अब पानी की एक बूंद भी बर्बाद नहीं होती। सिंचाई में समय भी कम लगता है।

जल संरक्षण की मिसाल बना है कासगंज क्षेत्र का गांव मामो। यहां गंगा सहाय और जगपाल दो भाई हैं। दोनों के अपने-अपने खेतों में नलकूप हैं। पूरे क्षेत्र के अन्य किसान अपने खेतों में इन्हीं नलकूपों से पानी लेते हैं। जो खेत नलकूप से काफी दूर हैं, वहां तक पानी पहुंचने में समय लगता था। खुले में बहते पानी का कुछ हिस्सा बर्बाद होना लाजिमी था। सिंचाई प्रबंधन को बेहतर बनाने के लिए दोनों भाइयो ने कुछ महीने पहले ग्रामीणों से बात की। प्रस्ताव रखा कि अपने-अपने खेत तक भूमिगत पाइप बिछाने पर सहमति दे दें। लागत नलकूप संचालक ही वहन करेंगे। किसान रजामंद हो गए।

सरसों, गेंहू और आलू की फसल के बाद खेत खाली हुए तब गंगा सहाय और जगपाल ने अपने-अपने नलकूप से पूरे क्षेत्र के खेतों में भूमिगत पाइप बिछवा दिए। हर खेत के मुहाने पर वाल्व लगवाए।

ऐसे की जाती है पानी की आपूर्ति

गंगा सहाय बताते हैं कि जिस किसान को पानी ले जाना होता है, हम वाल्व की चाबी उन्हें सौंप देते हैं। वो किसान अपने खेत में लगे वाल्व को चाबी से खोल लेता है। पाइपलाइन से पानी इधर-उधर न बहकर सीधे क्यारी तक पहुंच रहा है। इस विधि से पानी की काफी बचत हो रही है। ऐसे बच रहा पानी और समय

उदाहरण के तौर पर साधारण तरीके से सिंचाई करने पर एक बीघा खेत में एक घंटा 50 मिनट तक का समय लगता है। 100 रुपए प्रति घटा की दर से किसान को सिंचाई का भुगतान करना होता है। नलकूप से खेत तक की दूरी जितनी ज्यादा होती है, पानी की बर्बादी भी उतनी अधिक होती है। भूमिगत पाइपलाइन मात्र 80 मिनट में एक बीघा फसल की सिंचाई हो रही है। इस तरह पानी की बर्बादी बचती है, सिंचाई का समय बचता है। आकड़े की नजर से

-03 किलोमीटर पाइप बिछाए है खेतों में

-08लाख रुपए की लागत आई इस व्यवस्था में

-50 से अधिक किसान होने लगे लाभावित यह विधि बहुत अच्छी है। हमें समय की भी बचत हो रही है और पानी सीधे खेत तक पहुंच रहा है। खुले रास्ते में पानी इधर-उधर लेता बहता है। पाइपलाइन का पानी व्यर्थ नहीं बह रहा।

– राकेश कुमार, नगला मोहन इस विधि से जल संरक्षण हो रहा है और फसलों की सिंचाई में कम लागत के साथ ही समय की बचत हो रही है। यह विधि बेहतर विधि है। निकट भविष्य में ऐसे ही प्रयास और भी होने चाहिए।

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