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योग साधना से मन को स्वस्थ और प्रसन्न रखा जा सकता है, यह बात हमें समझनी होगी

महका संसार
  • 31 मई  को है “विश्व तंबाकू निषेध दिवस”

विशेष आलेख: नशा : “शान अथवा नाश”  

नशा नाश का द्वार है | जिसमें जाना तो आसान है, किन्तु बाहर आना थोड़ा मुश्किल | प्रतिवर्ष 31 मई को मनाये जाने वाले “विश्व तम्बाकू निषेध दिवस “ के मूल में एक सोच यह थी कि 24 घंटे, तम्बाकू एवं इससे बने उत्पादों के उपभोग पर सभी रूपों में संयम को प्रोत्साहित किया जाये | इस दिन का उदेश्य कम से कम एक दिन के लिए सभी का ध्यान तम्बाकू से होने वाले नुकसान की ओर आकर्षित एवम् केन्द्रित करना है | तम्बाकू उत्पादों के सेवन से प्रतिवर्ष 70 लाख लोगों की मौत भी हो जाती है और ये आंकड़ा प्रतिवर्ष नशा करने वालों की संख्या में इजाफे के साथ बढता जा रहा है |
RTI केतहत दाखिल एक याचिका के जवाब में भारत के गृह मंत्रालय द्वारा जारी किये गए आंकड़ों के अनुसार देश की 21.4% आबादी शराब, 3% गांजा – भांग, 0.7% अफीम, 0.1% इंजेक्शन व 3.6 प्रतिशत आबादी अन्य प्रकार के नशे की चपेट में है |[1] मंत्रालय के ये आंकड़े UNODC के प्रोजेक्ट Empowering Communities for Prevention of Drugs and HIV in India से जुटाए गए हैं | वहीं भारत सरकार के सामाजिक कल्याण एवं सशक्तीकरण मंत्रालय की 2019 में आई MAGNITUDE OF SUBSTANCE USE IN INDIA की रिपोर्ट के अनुसार भारत में शराब का सेवन करने वालों में महिला पुरुष अनुपात क्रमशः 1:17 है | [2] भारत में धुम्रपान करने वालो की संख्या 34.6% है । [3] तम्बाकू अथवा किसी भी नशे की ओर आकर्षित या नशे के आदी हो चुके व्यक्तियों द्वारा इसके लिए अक्सर तनाव, चिंता आदि कारण जिम्मेदार बताए जाते हैं | इसके अलावा सिगरेट अथवा मादक पदार्थों के सेवन को फैशन के रूप में भी स्वीकार किया जा रहा है | नशा सिर्फ उपभोग करने वालों का ही नहीं अपितु आस पास रहने वालों की जान का भी दुश्मन बनता है | भारत में शराब पीकर गाड़ी चलाने की वजह से प्रतिदिन औसतन 13 मौतें होती हैं |

भारत में इस सन्दर्भ में बने कानूनों का यदि सख्ती से पालन हो तो हमें नए कानून की आवश्यकता ही नहीं | किन्तु लोगों का जो वयवहार हाल ही में कोरोना संकट के दौरान शराब, पान, गुटखा इत्यादि हेतु देखा गया उसके आगे कितने भी नियम बना दिए जाये, वे धता ही साबित होंगे | वहीं दूसरी ओर यदि सरकार इनके निर्माण पर रोक लगाती है तो प्रतिवर्ष भारी राजस्व घाटे का सामना करना पड़ता है |
वास्तविकता तो यह है कि बदलाव हमें अपने स्तर से करना होगा | हमें अपने बच्चों को सिर्फ जीतना ही नहीं अपितु मानसिक रूप से मजबूत भी बनना भी सिखाना होगा | स्वदेशी दृष्टीकोण (Indigenous approach) के जरिये समस्याओं को हल करना सिखाना होगा | तनाव से छुटकारा पाने का एक मात्र साधन नशा ही तो नहीं | योग साधना द्वारा भी  मन को स्वस्थ एवं प्रसन्न रखा जा सकता है, यह बात हमें स्वयं भी समझनी होगी | बच्चे वही करते हैं जो वे अपने आस पास देखते हैं | अतः इसकी शुरुआत हमें बचपन से ही करनी होगी |
याद रहे, यदि आज भी हम नहीं जागे तो कल तक सिगरेट का धुआं हमारी जान सोखकर हमें सदा के लिए सुला देगा |
लेखिका:  करुणा शर्मा “लाडनूं”

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