जोधपुर राजस्थान स्पेशल स्टोरी

बढ़ती जनसंख्या, घाटे का मसौदा

                                            जनसंख्या दिवस पर विशेष

हर वर्ष 11 जुलाई का दिन हम विश्व जनसंख्या दिवस के रूप में मनाते आए हैं, इसकी शुरुआत 1989में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम की संचालक परिषद द्वारा हुई थी।उस समय विश्व की जनसंख्या करीब पांच करोड़ थी।इसके मनाने के रिवाज पर जाएं तो भान पड़ता है कि इस दिन बढ़ती जनसंख्या के परिणामों पर प्रकाश डाला जाता है और लोगो को जनसंख्या पर नियंत्रण रखने के लिए जागरूक किया जाता है। इसका मनाने का उद्देश्य यह भी है कि हर एक व्यक्ति इस बढ़ती जनसंख्या की ओर ध्यान देवे ओर जनसंख्या को रोकने में अपनी भूमिका निभाए।इस दिन कई जागरूक कार्यक्रमऔर परिवार नियोजन सम्बन्धी कार्यशाला आयोजित होती है तथाअबाद गति से बढ़ रही जनसंख्या पर चिंतन करते हैं, मनन करते है साथ ही अतीत को याद करते हुए इसमें सुधार लाने का प्रयास भी करते है मगर विडम्बना यह है की हम अब तक इस ज्वलंतम समस्या को नहीं रोक पाए, जिसके चलते आज भारत की आबादी एक सौ तीस करोड़ के लगभग है और चीन के बाद दूसरा स्थान आबादी में भारत का ही गिना जाता है। वर्तमान में सबसे तेज गति से जनसंख्या वृद्धि करने वाला देश नाईजीरिया है।देश में जनसंख्या की रफ्तार यूं ही रही तो अगले दशक में चीन को भी शायद पीछे छोड़ जाएगा।पीछे की और मूड के देखे तो पाएंगे कि आज से तकरीबन दस हजार साल पहले इस धरा पर कुछ लाख लोग ही निवास करते थे, लेकिन जितने हाथ उतनी ही ज्यादा आय वाली सोच रखने वालो ने इस जनसख्या ग्राफ को बढ़ा दिया ,नतीजन हम आगे तो बढ़ गए पर आज भी गरीबी रेखा को पाट नहीं पाए,सच में देखे तो यह रेखा उभरते देश पर एक कलंक है और विकास के पहिए को रोके हुए हैं,इतना ही नहीं भविष्य की संभावनाओं पर भी प्रश्नवाचक की मानिंद है।विकास की बात करे तो आज भी हम सही मायने में  देश की दशा को सुधार नहीं पाए और ना ही कोई ठोस निर्णय सही मायने में ले पाए हैं कि इसे कैसे रोके।
जरूरत आज इस बात की है कि इसको वृद्धि को रोकने हेतु सामाजिक और धार्मिक स्तर से जोड़ा जाए और जो ज्यादा संतान पैदा करता है उसे समाज से बहिष्कृत किया जाए तो कुछ असर जरूर देखने को मिलेगा।हम प्रकाशित आंकड़ों पर नजर डाले तो भान पड़ता है कि अगले दशक के लास्ट तक डेढ़ सो करोड़ की आबादी वाला अपना देश हो जाएगा।चल रहे मौजूदा हाल का अंदाजा लगाइए तो साफ दिखाई देता है कि (कोरोना काल में )इस ओर बढ़ोतरी होने का साफ संकेत है ,क्योंकि लॉक डाउन के दौरान अधिकतर समय घरों में ही गुजारना पड़ा था और कमोबेश आज भी वैसी ही स्तिथि है।अंदाज इस बात का भी लगाइए की फुर्सत के दौर में घर में मिला शकुन और एकांत इस सोच को ओर अधिक बलवती बनाता है। जनसंख्या की वृद्धि के मुख्य कारणों को जाने तो आज भी देश में ऐसे बहुत से लोग है जो शिशु जन्म को ईश्वर की देन मानते हैऔर वे नहीं जानते कि
 बढ़ती आबादी का सीधा सम्बन्ध गरीबी से होगा।अशिक्षा,बचपन में शादी कर देना और अल्पायु में ही बच्चा पैदा हो जाना भी जनसंख्या वृद्धि के प्रमुख कारण है। शिक्षा का अभाव भी जनसंख्या वृद्धि की एक बड़ी वजह है।आज भी रूढ़िवादी सोच और पुरुष प्रधान समाज में लड़के की चाहत में लोग कई बच्चे पैदा कर देते हैं।ऐसी सोच के लोग यह नहीं जानते कि परिवार की तरक्की नहीं होगी बच्चो का समुचित विकास नहीं हो पाएगा।गरीबी भी रहना भी इस बढ़ी हुई जनसंख्या का ही एक कारण है ।                  आज के परिप्रेक्ष्य में इन प्रमुख कारणों पर चिंता की जानी चाहिए साथ ही इस 21 वी सदी में तो बच्चा होना ईश्वर की देन मानने की धारणा नहीं पालनी चाहिए।सच कहें तो बढ़ी हुई यह जनसंख्या जहां गरीबी की तहरीर है तो वहीं स्वच्छ पेय जल की आपूर्ति करना भी मुश्किल भरा काम है खाद्यान्न उत्पादन को और बढ़ाना भी कितना मुश्किल हो जाएगा तनिक यह ख़्याल भी जहन में लाना चाहिए। बढ़ती जनसंख्या के कारण ही जल का स्तर घट गया है,वन सिमट गए है और उनकी जगह कंक्रीट के जंगलों ने लेली है।मोटर वाहन बढ़ती जनसंख्या के कारण खूब बढ़े है पर रोड बढ़ते वाहन और पॉपुलेशन के आगे सीमित हो गई है। फिर भी हम लालच वश बढ़ाने में ही लगे हुए हैं। समय रहते हैं हम होने वाले जनसंख्या विस्फोट के बारे में नहीं जागरूक न हुए तो विकास का लाभ बराबरी में नहीं बाट सकेंगे। अनेक प्रयासों के बावजूद भी अगर जनसंख्या रोकने में हम आगे नही आए तो देश की शिक्षा,स्वास्थ्य और कृषि क्षेत्र की सारी उपलब्धियां यह बढ़ती जनसंख्या डकार जाएगी तथा विकास के क्षेत्र में जो कयास लगाए बैठे हैं उन पर भी पानी फिरता नजर आएगा।   आपको बता देवे की 21वी सदी की यह ज्वलंतम मिशाल हमे प्रोग्रेसिव होने का जामा तो जरूर पहनाती है पर होने वाले इस विस्फोटक समस्या से आगाह भी करती है।इस जीमन में वैज्ञानिकों का मानना है कि डेढ़ अरब से ज्यादा जनसंख्या को भारत ना तो झेल पाएगा और ना ही पाल पाएगा क्योंकि एक दशक पहले जनसंख्या दर 1.6 प्रतिशत थी। दूसरे शब्दों में कहें तो विश्व का हर छठवां आदमी भारतीय है।इस द्रुतगामी रफ्तार से बढ़ रही जनसंख्या को रोकने का उपाय शायद न तो सरकार के पास है और ना ही समाज के पास होगा।गर किसी के पास हैं तो सिर्फ चिंता।भले ही  लोग आज भी अशिक्षित हो या गरीब अपने बढ़ते परिवार को लेकर चिंतित जरूर है।छोटे परिवार रखने का महत्व आज उन्हें समझ में जरूर अा गया है पर परिवार साधनों की कमी और अज्ञानता की ओट में इस वृद्धि को रोक नहीं पा रहें हैं।देखने में तो यह भी आया है कि परिवार नियोजन साधनों की कमी अन्य राज्यो की तुलना में राजस्थान में अधिक है।घुमंतू जातियां आज भी पर्याप्त जानकारी न होने के कारण लाचार है। तमाम कारणों को मध्य नजर रखते हुए अब हमे चेतने की जरूरत है नहीं चेते तो मुस्तकबिल में खाद्यान्न सामग्री और पेय जल आपूर्ति का टोटा पड़ जाएगा जिसकी पूर्ति करना न सरकार से संभव हो पाएगी और ना ही कोई भामाशाह के बश की बात रहेगी।समय रहते देश के खास और आम आदमी को चाहिए की वो अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझते हुए इस मुश्किल घड़ी में सुखद भविष्य के लिए सोचे,और हम दो हमारे दो के नारे को सार्थक बनाएं,आने वाली पीढ़ी के लिए विकास के दरवाजे बंद ना हो यह सोचकर भविष्य की मुश्किल को रोकेने के लिए हमे परिवार नियोजन जैसे कार्यक्रम से समाज के प्रमुख लोगो को  जोड़ना होगा, और स्वैच्छिक संगठनों का अधिक से अधिक सहयोग भी लेना होगा तब जाकर मानो एक सुखद भविष्य का सोपान तय होगा।
*डॉ.राजेंद्र कुमावत चिराना*
     ✍🏼… लेखक (बीजेएमसी स्नातक और आयुर्वेदाचार्य है) mob 7976819934.

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