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समलैंगिक जोड़ों की शादी की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट कर रहा है सुनवाई, चार लोगों ने दायर की पीआईएल

महका संसार

दिल्ली उच्च न्यायालय में शुक्रवार को एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर सुनवाई होने की संभावना है, जिसमें 1955 के हिंदू विवाह अधिनियम के तहत समलैंगिक जोड़ों को शादी करने का अधिकार देने का निर्देश दिया गया है, उनका तर्क है कि ऐसी यूनियनों पर रोक लगाना उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।

समलैंगिक जोड़ों की शादी 
LGBTI समुदाय के चार लोगों ने मिलकर 8 सितंबर को एक याचिका दायर की जिसकी सुनवाई दिल्ली के मुख्य न्यायाधीश एचसी डीएन पटेल और न्यायमूर्ति प्रतीक जालान की पीठ कर रही है। याचिका कहती है कि हिंदू  विवाह अधिनियम ये नहीं कहता है कि शादी एक हिंदू पुरुष और हिंदू स्त्री के बीच ही हो।  2018 में भारत के अंदर से समलैंगिकता को आपराधिक नहीं माना जाता है लेकिन यहां आज भी समलैंगिक शादी मान्य नहीं है। याचिका में कहा गया है, “समलैंगिक जोड़ों के अधिकारों की गैर-मान्यता, विशेष रूप से जब उनकी कामुकता को माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मान्य मान लिया गया हो, भारत के संविधान के विभिन्न प्रावधानों का उल्लंघन है।

समान-लिंग विवाह अधिकारों के मुद्दे पर दायर की जाने वाली यह दूसरी याचिका है। जनवरी के महीने केरल में रहने वाले एक युगल – निकेश पुष्करन और सोनू एमएस ने विशेष विवाह अधिनियम को चुनौती देते हुए केरल उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की है। दिल्ली हाईकोर्ट में – अभिजीत अय्यर मित्रा, गोपी शंकर, गीति थडानी और जी ओरवसी समेत चार लोगों ने ये याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता राघव अवस्थी ने कहा, “21 वीं सदी में, कोई कारण नहीं है कि समान लिंग वाले लोगों को दूसरों के समान अधिकारों का आनंद नहीं लेना चाहिए।”

याचिकाकर्ता गोपी शंकर ने कहा, “समानता महत्वपूर्ण है। हमारे पास विविध एलजीबीटीआई समुदाय के लोग हैं, जो रजिस्ट्रार द्वारा उनके विवाह समारोहों को स्वीकार करने या रजिस्टर करने से इनकार कर रहे हैं। मैं अपने साथी से भी शादी करना चाहता हूं और हमारे रिश्ते को रजिस्टर करना चाहता हूं। ”

कानून में कहीं नहीं है जिक्र

शंकर ने 2019 के मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले की ओर इशारा किया, जिसमें एक आदमी और एक ट्रांसवुमन के बीच विवाह को बरकरार रखा गया था, जिसमें कहा गया था कि हिंदू विवाह अधिनियम में ‘दुल्हन’ शब्द में एक ट्रांसवोमन भी शामिल है। 2018 में समलैंगिकता को आपराधिक श्रेणी से हटाने वाले सुप्रीम कोर्ट के वकील सौरभ कृपाल ने कहा, “कानून में लिखे गए शब्द समान-लिंग के लोगों की शादी के प्रावधान से बाहर नहीं करते हैं लेकिन सामान्य व्यवहार उन्हें कानून से बाहर समझता है अदालत को, हालांकि, समान-लिंग विवाहों को न केवल एक विधायी चूक के रूप में, बल्कि एक सकारात्मक तथ्य के रूप में पहचानना चाहिए।”

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