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मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026
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आखिर कौन चाहता है कि चोटिला दरगाह आना बंद कर दें जायरीन?

दरगाह कमेटी की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल, सुविधाओं के अभाव में परेशान जायरीन, ट्रेनों का ठहराव बंद, खाने-पीने तक के इंतजाम नहींजोधपुर/पाली। चोटिला का नाम आते ही पीर दूल्हे शाह बाबा की दरगाह की तस्वीर…

आखिर कौन चाहता है कि चोटिला दरगाह आना बंद कर दें जायरीन?
आखिर कौन चाहता है कि चोटिला दरगाह आना बंद कर दें जायरीन?

दरगाह कमेटी की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल, सुविधाओं के अभाव में परेशान जायरीन, ट्रेनों का ठहराव बंद, खाने-पीने तक के इंतजाम नहीं

जोधपुर/पाली। चोटिला का नाम आते ही पीर दूल्हे शाह बाबा की दरगाह की तस्वीर सामने आ जाती है। सैकड़ों वर्षों से यहां जायरीन अपनी मुरादें लेकर आते हैं, दुआएं मांगते हैं और मुरादें पूरी होने पर दोबारा हाजिरी देकर शुक्राना अदा करते हैं। यह दरगाह लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र रही है, लेकिन आज यहां आने वाले जायरीनों को बुनियादी सुविधाओं के अभाव में परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

विडंबना यह है कि जिस दरगाह पर जायरीन दूर-दराज से श्रद्धा और विश्वास के साथ पहुंचते हैं, वहां पीने के पानी जैसी आवश्यक सुविधा के लिए भी परेशानी उठानी पड़ सकती है। खाने-पीने की दुकानों का अभाव, आवागमन की समस्याएं और अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी ने जायरीनों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर दरगाह की व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी संभालने वाली कमेटी जायरीनों की सुविधाओं को लेकर कितनी गंभीर है? क्या जायरीनों की परेशानियों को दूर करना कमेटी की प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए?

ट्रेनों का ठहराव बंद, वीरान पड़ा रेलवे स्टेशन

एक समय था, जब जायरीन ट्रेन से चोटिला दरगाह पहुंचा करते थे। स्थानीय लोगों के अनुसार, कोयले और भाप के इंजन के दौर से लेकर छोटी लाइन और फिर बड़ी लाइन के समय तक यहां ट्रेनों का ठहराव होता रहा। लेकिन पिछले करीब 15 वर्षों से यहां रेलवे स्टेशन पर ट्रेनों का ठहराव बंद हो चुका है।

ट्रेनों का ठहराव बंद होने से रेल मार्ग से आने वाले जायरीनों को परेशानी का सामना करना पड़ता है। रेलवे की ओर से यात्री भार में कमी को ठहराव बंद होने का कारण बताया गया था। हालांकि, यात्री भार कम होने के पीछे स्थानीय सुविधाओं की कमी की भूमिका रही है।

यदि किसी धार्मिक स्थल पर पहुंचना ही मुश्किल हो जाए और वहां पहुंचने के बाद भी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध न हों, तो जायरीनों की संख्या प्रभावित होना स्वाभाविक है। ऐसे में रेलवे स्टेशन पर ट्रेनों के ठहराव की बहाली के लिए प्रयास करने के साथ-साथ दरगाह क्षेत्र की व्यवस्थाओं में सुधार करना भी जरूरी है।

न होटल, न दुकानें, न चाय की थड़ी; आखिर जायरीन क्या करें?

किसी भी धार्मिक स्थल पर दूर-दराज से आने वाले लोगों को कम से कम पीने का पानी, चाय, नाश्ता और भोजन जैसी बुनियादी सुविधाएं मिलनी चाहिए। लेकिन चोटिला दरगाह क्षेत्र में जायरीनों को इन सुविधाओं के लिए भी परेशानी उठानी पड़ने की शिकायतें सामने आ रही हैं।

यहां आने वाले लोगों के मुताबिक, यहां खाने-पीने के लिए न पर्याप्त होटल हैं, न दुकानें और न ही चाय-नाश्ते की थड़ियां। मस्जिद के पास एक छोटी-सी दुकान जरूर है, लेकिन वहां भी सीमित सामान ही उपलब्ध है।

ऐसे में परिवार के साथ आने वाले जायरीनों, बुजुर्गों और बच्चों को विशेष परेशानी होती है। घर से लंबी यात्रा करके आने वाला हर व्यक्ति अपने साथ जरूरत की प्रत्येक वस्तु लेकर नहीं आ सकता। ऐसे में दरगाह क्षेत्र में जरूरी सुविधाओं का उपलब्ध होना बेहद आवश्यक है।

दुकानें लगाने को लेकर भी उठ रहे सवाल

स्थानीय लोगों ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया कि यदि कोई व्यक्ति खाली जगह पर चाय की थड़ी या खाने-पीने का ठेला लगाना चाहता है, तो कथित तौर पर उससे कमेटी के कुछ लोगों द्वारा पैसे मांगे जाते हैं।

लोगों का कहना है कि जब जायरीनों की संख्या ही कम हो गई है और कारोबार की संभावनाएं सीमित हैं, तो ऐसे में छोटे दुकानदारों के लिए नियमित खर्च निकालना भी मुश्किल हो जाता है। यदि दुकान लगाने की प्रक्रिया में अनावश्यक आर्थिक बाधाएं हैं, तो उनका समाधान किया जाना चाहिए, ताकि स्थानीय लोगों को रोजगार मिले और जायरीनों को जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हो सकें।

यदि कमेटी की ओर से दुकानों के संचालन के लिए कोई निर्धारित नियम या शुल्क व्यवस्था है, तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए, ताकि स्थिति स्पष्ट हो सके।

उर्स के समय दिखती है सक्रियता, फिर बाकी दिनों में व्यवस्थाएं क्यों बदहाल?

दरगाह में उर्स का आयोजन आस्था और परंपरा से जुड़ा महत्वपूर्ण अवसर होता है। इस दौरान बड़ी संख्या में जायरीन पहुंचते हैं और आयोजन को सफल बनाने के लिए व्यापक व्यवस्थाएं की जाती हैं।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि उर्स के दौरान दरगाह कमेटी के पदाधिकारी सक्रिय दिखाई देते हैं, लेकिन आयोजन समाप्त होने के बाद नियमित सुविधाओं और विकास कार्यों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता। लोगों का कहना है कि दरगाह की व्यवस्थाएं केवल उर्स तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि पूरे वर्ष जायरीनों की सुविधा के लिए काम होना चाहिए।

उर्स के दौरान प्राप्त होने वाले चंदे और दान का उपयोग दरगाह की सुविधाओं, रखरखाव और विकास कार्यों में किस प्रकार किया जाता है, यह भी पारदर्शिता के साथ सामने आना चाहिए। यदि आय और व्यय का नियमित विवरण सार्वजनिक किया जाए, तो लोगों का विश्वास मजबूत होगा और विकास कार्यों की वास्तविक स्थिति भी स्पष्ट हो सकेगी।

सवाल यह है कि यदि दरगाह पर आने वाले जायरीनों को बुनियादी सुविधाएं ही नहीं मिलेंगी, तो वे बार-बार यहां आने के लिए कैसे प्रेरित होंगे?

जायरीन बोले—उर्स के अलावा भी दरगाह पर आना चाहते हैं, लेकिन सुविधाएं मिलें तो सही

आम दिनों में भी दरगाह पर हाजिरी देने की इच्छा रखने वाले जायरीनों का कहना है कि वे उर्स के अलावा अन्य दिनों में भी चोटिला आना चाहते हैं, लेकिन यहां सुविधाओं की कमी के कारण उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

जायरीनों की मांग है कि दरगाह क्षेत्र में पीने के पानी, साफ-सफाई, खाने-पीने की दुकानों और आवागमन की सुविधाओं को बेहतर बनाया जाए। साथ ही, स्थानीय प्रशासन, रेलवे और संबंधित जिम्मेदार विभागों के साथ समन्वय स्थापित कर समस्याओं का स्थायी समाधान किया जाए।

दरगाह कमेटी का दायित्व केवल विशेष आयोजनों का संचालन करना ही नहीं, बल्कि पूरे वर्ष दरगाह आने वाले जायरीनों की सुविधा, व्यवस्था और धार्मिक स्थल के रखरखाव पर ध्यान देना भी है।

महका संसार उठाएगा चोटिला दरगाह की व्यवस्थाओं का मुद्दा

चोटिला दरगाह की मौजूदा व्यवस्थाओं को लेकर सामने आ रही शिकायतें गंभीर सवाल खड़े करती हैं। यह मामला केवल सुविधाओं की कमी का नहीं, बल्कि जायरीनों की आस्था, स्थानीय रोजगार और धार्मिक स्थल के समुचित विकास से भी जुड़ा है।

दैनिक महका संसार इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाएगा और दरगाह की व्यवस्थाओं, उपलब्ध सुविधाओं, विकास कार्यों तथा कमेटी की आय और खर्च से संबंधित तथ्यों का क्रमबद्ध विश्लेषण पाठकों के सामने रखा जाएगा।

इस खबर को अलग-अलग भागों में प्रकाशित किया जाएगा, ताकि दरगाह की वास्तविक स्थिति, आय व्यय की जानकारी और जायरीनों की समस्याओं और जिम्मेदार संस्थाओं की भूमिका को विस्तार से समझा जा सके।

आस्था के इस केंद्र पर आने वाले जायरीनों को सम्मान और बुनियादी सुविधाएं मिलना उनका जायज हक है। अब देखना यह है कि दरगाह कमेटी, रेलवे और संबंधित प्रशासन इन समस्याओं के समाधान के लिए क्या कदम उठाते हैं।

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संपादकीय टीम · Maheka Sansar

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