रात के अंधेरे में “दुर्ग पर डाका”: सफेदपोश की सच्चाई बेनकाब

जैसलमेर। दिन में नियम-कानून की दुहाई देने वाले और खुद को जिम्मेदार जनप्रतिनिधि बताने वाले निवर्तमान सभापति का असली चेहरा अब रात के अंधेरे में सामने आ रहा है। विश्व धरोहर सोनार दुर्ग की प्रतिबंधित सीमा में आधी रात को चोरी-छिपे करवाया जा रहा निर्माण सीधे-सीधे कानून को ठेंगा दिखाने जैसा है।

यह कोई साधारण उल्लंघन नहीं, बल्कि धरोहर पर सीधा “हमला” है। जब पूरा शहर सो रहा होता है, तब सत्ता और रसूख के नशे में चूर लोग कानून की लाश पर निर्माण की ईंटें रख रहे हैं। आखिर ऐसा क्या डर है कि दिन के उजाले में काम नहीं हो सकता?
चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ दिन पहले ही नगर परिषद और पुरातत्व विभाग ने इस अवैध निर्माण को रुकवाया था, मशीनें जब्त की थीं, लेकिन अब फिर से उसी स्थान पर काम शुरू होना साफ संकेत देता है—या तो कार्रवाई महज दिखावा थी या फिर सिस्टम पूरी तरह से घुटनों पर है।
नगर परिषद कार्यालय से कुछ ही दूरी पर चल रहा यह खेल क्या अधिकारियों को दिखाई नहीं दे रहा? या फिर आंखें जानबूझकर बंद कर ली गई हैं? क्या प्रभावशाली लोगों के लिए कानून सिर्फ किताबों तक सीमित है?

जनता पूछ रही है—

क्या सोनार दुर्ग अब रसूखदारों की निजी जागीर बन चुका है?

क्या नियम सिर्फ गरीब और आम लोगों के लिए ही बनाए गए हैं?

क्या प्रशासन ने “मूक दर्शक” बनने की कसम खा ली है?

अगर अब भी सख्त कार्रवाई नहीं हुई तो यह सिर्फ एक निर्माण नहीं रहेगा, बल्कि यह मिसाल बन जाएगा कि कैसे पैसे और पद के दम पर विश्व धरोहर को भी रौंदा जा सकता है।
प्रशासन यह तय करे कि वह कानून के साथ खड़ा है या कानून तोड़ने वालों के साथ?