खसरा नंबर 416 की भूमि पर निर्माण और वर्षों से क्लब संचालन को लेकर प्रशासन से जांच की मांग, आमसूचना ने बढ़ाए सवाल
पत्रकार नरेंद्र सिंह भाटी
सिरोही। सरूप विला क्लब के संचालन को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि क्लब का संचालन ऐसी भूमि पर किया जा रहा है, जिसे सरकारी/गैर-बिलानाम भूमि बताया जा रहा है। खास तौर पर खसरा नंबर 416 की भूमि पर निर्माण और वर्षों से क्लब के संचालन को लेकर प्रशासन से निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग उठ रही है।
मामले में 11 अगस्त 2026 को जारी क्लब की आमसूचना को लेकर सवाल उठाया जा रहा है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि आमसूचना में ही भूमि के वैध पट्टे, सहकारिता विभाग में पंजीयन तथा आबकारी विभाग से क्लब-बार लाइसेंस/पंजीयन को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होती है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि भूमि का वैध पट्टा, संचालन की अनुमति और आवश्यक पंजीयन उपलब्ध नहीं है तो क्लब इतने वर्षों से किस कानूनी आधार पर संचालित होता रहा?
खसरा नंबर 416 पर निर्माण किस अनुमति से?
शिकायतकर्ताओं ने खसरा नंबर 416 को गैर-बिलानाम/सरकारी भूमि बताते हुए सवाल उठाया है कि यदि भूमि सरकारी है तो उस पर क्लब भवन अथवा अन्य निर्माण किस अनुमति के आधार पर हुआ। निर्माण के लिए किस विभाग से स्वीकृति ली गई और भूमि उपयोग की अनुमति किसके द्वारा दी गई—इन तमाम बिंदुओं की जांच की मांग की गई है।
सदस्यता शुल्क और वित्तीय लेनदेन भी जांच के घेरे में
मामले में केवल भूमि और निर्माण ही नहीं, बल्कि क्लब की सदस्यता, सदस्यता शुल्क, बैंक खातों, आय-व्यय तथा वर्षों से हुए वित्तीय लेनदेन की भी जांच की मांग उठाई गई है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि संस्था का वैध पंजीयन ही नहीं था, तो सदस्यता शुल्क किस आधार पर लिया गया और उसका लेखा-जोखा किस संस्था के नियमों के तहत रखा गया, यह भी जांच का विषय है।
जिला कलेक्टर से FIR सहित कार्रवाई की मांग
आमजन की ओर से जिला कलेक्टर से पूरे मामले की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच करवाने की मांग की गई है। मांग है कि राजस्व रिकॉर्ड में खसरा नंबर 416 की वास्तविक स्थिति, भूमि का स्वामित्व, निर्माण की अनुमति, क्लब का पंजीयन, आबकारी विभाग की अनुमति/लाइसेंस और वित्तीय लेनदेन की जांच कराई जाए।
शिकायतकर्ताओं ने यह भी मांग की है कि यदि जांच में सरकारी भूमि पर अवैध कब्जा, बिना अनुमति निर्माण अथवा बिना वैध पंजीयन संचालन की पुष्टि होती है तो संबंधित जिम्मेदार व्यक्तियों एवं वर्तमान कार्यकारिणी के विरुद्ध FIR दर्ज कर नियमानुसार कानूनी कार्रवाई की जाए।
बड़ा सवाल—‘सालों से चल रहा था’ क्या कानूनसम्मत होने का प्रमाण है?
इस पूरे मामले में सबसे अहम सवाल यही है कि किसी संस्था का वर्षों तक संचालित होना अपने आप में उसके वैध होने का प्रमाण कैसे माना जा सकता है? यदि भूमि सरकारी है और आवश्यक पट्टा, पंजीयन अथवा अनुमति उपलब्ध नहीं है तो प्रशासन की जिम्मेदारी तय करने की मांग भी उठ रही है। अब निगाहें जिला प्रशासन पर हैं कि वह खसरा नंबर 416 की भूमि का रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करता है या नहीं, क्लब के निर्माण एवं संचालन की वैधानिकता की जांच कराता है या नहीं और यदि नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो जिम्मेदारों पर क्या कार्रवाई होती है।
सरकारी भूमि किसी संस्था या व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं हो सकती। अब सवाल जांच का है—और जवाब प्रशासन को देना है।