जिस सरकारी महकमे पर खाद्य पदार्थों की नियमित जांच और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई को अमल में लाने की जिम्मेदारी है, क्या वह अपना दायित्व ठीक से निभा रहा है या नहीं?
इम्तियाज अहमद
जयपुर। देश में खाद्य पदार्थों में मिलावट एक गंभीर समस्या बन गई है। इससे न केवल शुद्ध एवं गुणवत्तापूर्ण वस्तुओं का संकट पैदा हो गया है, बल्कि इसकी वजह से लोग कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं से भी जूझ रहे हैं।
केंद्र और राज्य सरकारों के तमाम दावों के बावजूद मुनाफा कमाने के इस अवैध कारोबार पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण के ताजा आंकड़ों से साफ है कि मिलावटी वस्तुओं का बाजार बेरोक-टोक फल-फूल रहा है।
वर्ष 2025-2026 में देश भर में पांच लाख से अधिक खाद्य प्रतिष्ठानों के निरीक्षण के बाद दो लाख से ज्यादा नमूने लिए गए थे। इनमें से चालीस हजार नमूने गैर-मानक पाए गए, जिनमें सबसे ज्यादा बीस हजार नमूने उत्तर प्रदेश के थे। हालांकि देश के अन्य राज्यों में भी स्थिति अच्छी नहीं है।
यह अक्सर देखा गया है कि गुणवत्ता जांचने के लिए जब भी खाद्य पदार्थों के नमूने लिए जाते हैं, तो उनमें से ज्यादातर में मिलावट पाई जाती है। आखिर क्या वजह है कि कानूनी प्रावधानों के बावजूद खाद्य पदार्थों में मिलावट के अवैध धंधे का जाल फैलता जा रहा है। सवाल है कि जिस सरकारी महकमे पर खाद्य पदार्थों की नियमित जांच और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई को अमल में लाने की जिम्मेदारी है, क्या वह अपना दायित्व ठीक से निभा रहा है या नहीं?
जो मामले दर्ज होते हैं, उनमें भी दोषियों को सजा मिलने की दर अगर बेहद कम रहती है, तो यह किसकी लापरवाही है। जाहिर है कि संबंधित महकमे के कर्मियों की साठगांठ की वजह से ही अक्सर मिलावट करने वाले बच निकलते हैं।
यही कारण है कि इस अवैध कारोबार में संलिप्त लोगों को कानून का कोई खौफ नहीं रह गया है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि खाद्य पदार्थों की निगरानी और जांच का जिम्मा संभालने वाले अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए और मिलावटखोरों को संरक्षण देने वालों के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई अमल में लाई जाए। इसके अलावा आम लोगों को भी मिलावटी पदार्थों के प्रति व्यापक स्तर पर जागरूक किए जाने की जरूरत है।