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बुधवार, 21 अक्टूबर 2026
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लखनऊ में शक्ति प्रदर्शन के बाद क्या यूपी की सियासत में लौट पाएगी बसपा?

कांशीराम की पुण्यतिथि पर मायावती ने भारत रत्न की मांग उठाई; शून्य पर पहुंची पार्टी के सामने दलित वोट बचाने की चुनौती

लखनऊ में शक्ति प्रदर्शन के बाद क्या यूपी की सियासत में लौट पाएगी बसपा?
लखनऊ में समर्थकों का अभिवादन करतीं बसपा प्रमुख मायावती (फोटो: बीबीसी हिंदी)

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से करीब पांच महीने पहले बहुजन समाज पार्टी ने लखनऊ में अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की। 9 अक्टूबर को पार्टी संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि पर इको गार्डन में बड़ी संख्या में कार्यकर्ता जुटे और मायावती को फिर मुख्यमंत्री बनाने का संकल्प लिया। मायावती ने माल एवेन्यू में कांशीराम को श्रद्धांजलि दी।

इस मौके पर मायावती ने राज्य सरकार पर निशाना साधा और कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग की। उन्होंने याद दिलाया कि उनके नेतृत्व में बसपा प्रदेश में चार बार सत्ता में आई। लेकिन मौजूदा हालात पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण हैं, क्योंकि संसद और राज्य विधानमंडल में बसपा का फिलहाल एक भी सदस्य नहीं है।

प्रदेश में दलित आबादी करीब 20-21 प्रतिशत मानी जाती है, जिसका असर 140 से ज्यादा सीटों पर पड़ता है। 403 सीटों वाली विधानसभा में 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं। यही वजह है कि भाजपा, सपा और कांग्रेस सभी इस वर्ग को साधने में जुटे हैं। सपा पीडीए फॉर्मूले पर काम कर रही है, जबकि कांग्रेस ने दलित नेता राजेंद्र पाल गौतम को यूपी प्रभारी बनाया है।

विश्लेषकों के मुताबिक 2012 के बाद से बसपा का वोट लगातार घटा है और 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी खाता भी नहीं खोल सकी। पश्चिमी यूपी में चंद्रशेखर आजाद की आजाद समाज पार्टी भी चुनौती बनकर उभरी है। ऐसे में लखनऊ का यह जमावड़ा दलित वोटों पर पकड़ साबित करने की कोशिश माना जा रहा है।

स्रोत: बीबीसी हिंदी

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राजनीति डेस्क · संपादकीय डेस्क

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