इस सप्ताह दवाओं से जुड़ी दो खबरें एक साथ आईं। पहली, राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) ने 137 नॉन-शेड्यूल्ड कैंसर दवाओं पर व्यापार मार्जिन 30 प्रतिशत तय कर दिया, जो 9 नवंबर से लागू होगा। दूसरी, आईआईआईटी दिल्ली के शोधकर्ताओं के एक अध्ययन में सामने आया कि आम संक्रमणों में इस्तेमाल होने वाली कुछ एंटीबायोटिक दवाएं बड़ी संख्या में बैक्टीरिया पर बेअसर हो रही हैं। दोनों खबरें मिलकर सार्वजनिक स्वास्थ्य की एक पूरी तस्वीर पेश करती हैं।
कैंसर का इलाज परिवारों को आर्थिक रूप से तोड़ देता है। ऐसे में मार्जिन पर सीमा लगाने का फैसला मरीजों के लिए राहत की उम्मीद जगाता है। हालांकि इसका असर तभी दिखेगा जब दवा दुकानों तक घटी कीमतें सचमुच पहुंचें और निगरानी व्यवस्था सक्रिय रहे। साथ ही यह ध्यान रखना होगा कि कीमत नियंत्रण से दवाओं की उपलब्धता प्रभावित न हो।
एंटीबायोटिक प्रतिरोध का खतरा कहीं ज्यादा व्यापक है। अध्ययन में करीब 2.57 करोड़ पर्चों का विश्लेषण हुआ, जिनमें लगभग हर दसवें पर्चे में एंटीबायोटिक लिखी थी। पेशाब के संक्रमण से जुड़े ई. कोलाई बैक्टीरिया में सिप्रोफ्लॉक्सासिन के प्रति 57 प्रतिशत और सेफ्ट्रियाक्सोन के प्रति करीब 54 प्रतिशत प्रतिरोध मिला। इसका अर्थ है कि साधारण संक्रमण का इलाज भी आने वाले समय में कठिन और महंगा हो सकता है।
इसके लिए किसी एक पक्ष को दोष देना ठीक नहीं होगा। मरीजों में जल्दी ठीक होने की चाह, बिना पर्चे दवा मिल जाना, अधूरा कोर्स छोड़ देना और कई बार जांच के बिना दवा लिखना, सब मिलकर समस्या बढ़ाते हैं। समाधान भी साझा होना चाहिए: डॉक्टरों के लिए स्पष्ट उपचार दिशानिर्देश, दवा दुकानों पर पर्चे के नियम का सख्त पालन, ऑनलाइन बिक्री की निगरानी और लोगों में जागरूकता।
सस्ती दवा और सुरक्षित दवा एक ही नीति के दो पहलू हैं। अगर हम कीमतें घटाने के साथ दवाओं के विवेकपूर्ण इस्तेमाल को भी उतनी ही गंभीरता से नहीं लेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए आज की कारगर दवाएं बेकार साबित हो सकती हैं।
— महका संसार डेस्क


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