एशियाई खेलों में भारत के प्रदर्शन की समीक्षा बैठक में खेल मंत्री मनसुख मांडविया का यह सवाल कि मीराबाई चानू अकेले कब तक पदक जिताती रहेंगी, भारतीय खेल व्यवस्था की एक पुरानी कमजोरी को रेखांकित करता है। आइची-नागोया में भारत ने 21 स्वर्ण समेत 85 पदक जीते, जो सम्मानजनक संख्या है, लेकिन हांगझोउ के 106 पदकों की तुलना में यह गिरावट है। सवाल केवल संख्या का नहीं, बल्कि प्रतिभाओं की गहराई का है।
किसी भी खेल में कुछ चुनिंदा सितारों पर निर्भरता जोखिम भरी होती है। चोट, फॉर्म या उम्र का असर पड़ते ही पूरी उम्मीदें धराशायी हो जाती हैं। मंत्री का यह कहना उचित है कि 2028 के लॉस एंजिलिस ओलंपिक और 2030 के एशियाई व राष्ट्रमंडल खेलों के लिए पदक दावेदारों का बड़ा पूल तैयार करना होगा। शूटिंग, एथलेटिक्स, बैडमिंटन, तैराकी और फेंसिंग जैसे खेलों से जवाब मांगना भी जवाबदेही की दिशा में कदम है।
हालांकि तस्वीर का दूसरा पहलू भी देखना होगा। बैठक में चोटिल खिलाड़ियों को भेजने और कोच साथ न भेजे जाने जैसे मुद्दे उठे। ये संकेत हैं कि समस्या केवल खेल संघों की नहीं, बल्कि चयन, खेल विज्ञान, फिटनेस प्रबंधन और प्रशासनिक तालमेल की भी है। जब मंत्रालय कहता है कि अब पैसे की कमी बहाना नहीं है, तो उसके साथ यह भी जरूरी है कि धन का उपयोग पारदर्शी हो और परिणामों का नियमित आकलन सार्वजनिक रूप से हो।
जमीनी स्तर पर स्कूल-कॉलेज खेलों को मजबूत करना, जिला स्तर पर प्रशिक्षण केंद्रों की गुणवत्ता सुधारना और खिलाड़ियों को चोट से उबरने की आधुनिक सुविधाएं देना दीर्घकालिक उपाय हैं। खेल संघों में पेशेवर प्रबंधन और खिलाड़ियों की भागीदारी बढ़ाना भी जरूरी है।
समीक्षा बैठकें तभी सार्थक हैं जब उनसे निकले निष्कर्ष अगले चार साल की स्पष्ट योजना में बदलें। भारत को दस नहीं, सैकड़ों मीराबाई चाहिए, और वे केवल व्यवस्था के निरंतर, ईमानदार प्रयास से ही तैयार होंगी।
— महका संसार डेस्क


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