कोलकाता के चोरबागान दुर्गा पूजा पंडाल में शनिवार रात मची भगदड़ में 19 लोगों की मौत और दो दर्जन से अधिक लोगों का घायल होना केवल एक शहर का दुख नहीं है। यह उस व्यापक चुनौती की ओर इशारा करता है, जिसका सामना देश हर त्योहारी मौसम में करता है। हमारे पर्व सामूहिक आस्था के उत्सव हैं, लेकिन जहां लाखों लोग एक साथ जुटते हैं, वहां छोटी सी चूक भी बड़ी त्रासदी बन सकती है।
शुरुआती जानकारी के अनुसार बारिश के बीच अचानक भीड़ बढ़ी और एक घोषणा के बाद अफरा-तफरी मच गई। प्रवेश और निकास का रास्ता संकरा बताया गया, रोशनी अपर्याप्त थी और भीड़ संभालने वाले स्वयंसेवक प्रशिक्षित नहीं थे। राज्य सरकार ने न्यायिक जांच, मुआवजे और गिरफ्तारियों के कदम उठाए हैं तथा पंडालों में सशुल्क वीआईपी गेट हटाने पर विचार की बात कही है। ये कदम जरूरी हैं, पर असली परीक्षा यह है कि अगले साल व्यवस्था कितनी बदली दिखती है।
भीड़ प्रबंधन अब अनुमान का नहीं, विज्ञान का विषय है। बड़े आयोजनों के लिए क्षमता का पहले से आकलन, अलग-अलग प्रवेश और निकास द्वार, आपात रास्तों का खुला रहना, मौसम बिगड़ने की स्थिति की तैयारी और सार्वजनिक घोषणाओं के लिए तय प्रोटोकॉल अनिवार्य होने चाहिए। आयोजन समितियों की अनुमति को इन शर्तों के पालन से जोड़ा जाना चाहिए और स्वयंसेवकों को बुनियादी प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
वीआईपी संस्कृति पर पुनर्विचार भी जरूरी है। जब एक हिस्से को विशेष प्रवेश मिलता है, तो आम श्रद्धालुओं की कतारें और दबाव बढ़ता है। आस्था के स्थल पर बराबरी का भाव ही सुरक्षा का भी आधार बन सकता है। तकनीक की मदद से भीड़ की वास्तविक समय में निगरानी और डिजिटल टाइम-स्लॉट जैसी व्यवस्थाएं भी आजमाई जा सकती हैं।
दशहरा, दीपावली और छठ जैसे पर्व सामने हैं। देशभर के प्रशासन और आयोजकों के लिए यह समय कोलकाता की पीड़ा से सबक लेकर अपनी तैयारियों की समीक्षा करने का है, ताकि उत्सव का उल्लास किसी परिवार के लिए जीवनभर का शोक न बने।
— महका संसार डेस्क


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