मुंबई के जुहू में अभिनेता टाइगर श्रॉफ की कार पर हुई फायरिंग और उसके बाद एक गैंग से जुड़े व्यक्ति द्वारा सोशल मीडिया पर जिम्मेदारी लेना चिंता बढ़ाने वाला है। पोस्ट में खुलेआम धमकी दी गई कि फिल्म उद्योग में जो भी उनकी बात नहीं मानेगा, वह अगला निशाना होगा। इसी सप्ताह दिवंगत गायक सिद्धू मूसेवाला के ढाई साल के भाई का एक वीडियो विवाद में आया, जिसमें वह मंच पर हाथ से बंदूक चलाने का इशारा करता दिखा। एक मानवाधिकार संगठन ने इस पर बाल संरक्षण इकाई में शिकायत दी है।
पहली घटना कानून-व्यवस्था की चुनौती है, दूसरी सामाजिक मानसिकता की। लेकिन दोनों के बीच एक धागा है, बंदूक और दबंगई का बढ़ता महिमामंडन। गीतों, वीडियो और सोशल मीडिया पर हथियारों को शान और ताकत का प्रतीक बनाकर पेश किया जाता है। जब यही छवि बच्चों और युवाओं के मन में बैठती है, तो अपराधी गिरोहों को नए रंगरूट और लोकप्रियता दोनों आसानी से मिल जाते हैं।
सरकार ने हमलावरों को जल्द पकड़ने का भरोसा दिया है और विपक्ष ने कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। राजनीतिक बहस अपनी जगह है, पर असली जरूरत ऐसे गिरोहों के नेटवर्क, विदेश से संचालित धमकियों और फंडिंग पर निर्णायक कार्रवाई की है। सोशल मीडिया पर अपराध की जिम्मेदारी लेने वाली पोस्ट तेजी से हटें और उनके पीछे के खातों की पहचान हो, यह भी उतना ही अहम है।
बच्चे से जुड़े मामले में संवेदनशीलता जरूरी है। एक शोकाकुल परिवार को कटघरे में खड़ा करना उचित नहीं, लेकिन यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि सार्वजनिक मंचों पर बच्चों से जुड़े प्रदर्शन किस तरह के संदेश देते हैं। कलाकारों, आयोजकों और प्लेटफॉर्मों को भी आत्ममंथन करना होगा।
किसी भी समाज की सुरक्षा केवल पुलिस की ताकत से नहीं, उसकी सांस्कृतिक दिशा से भी तय होती है। बंदूक को नायकत्व का प्रतीक मानने की प्रवृत्ति पर रोक लगाए बिना गैंगों का खौफ पूरी तरह खत्म करना मुश्किल होगा।
— महका संसार डेस्क


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